Saturday, June 6, 2015

PM Krishak Sinchai Yojna


प्रधानमंत्री कृषक सिंचाई योजना: पूर्वी भारत के लिये एक ठोस रणनीति
रमेश चन्द्र श्रीवास्तव, 
भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुवनेश्वर-751023, ओडिशा
     गरीबी हटाने के लिए कृषि उत्पादकता को बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है लेकिन कृषि उत्पादकता को बढ़ाना एवं इसे स्थिरता प्रदान करना तभी संभव है जब सिंचाई की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हों क्यूंकी सिंचाई सुविधाएं कृषि उत्पादन के लिए एक उत्प्रेरक का काम करती है। बड़े जलाशयों पर आधारित नहर सिंचाई प्रणाली  तथा गहरे नलकूप जैसे सिंचाई साधनों की अपनी सीमाएं हैं और यह सभी क्षेत्रों में उपयोग में नहीं लाये जा सकते। सिंचाई के लाभ में सभी भूभागों की भागीदारी हो, इसीलिए माननीय प्रधानमंत्री जी ने प्रधानमंत्री कृषक सिंचाई परियोजना की शुरुआत की जिसका उद्देश्य सभी कृषकों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाना है।
     पिछले अड़तीस वर्षों के वर्षा जल प्रबंधन अनुसंधान के अनुभव से मैंने पाया है कि 750 मिमी. वर्षा से ज्यादा बारिश वाले इलाकों में वर्षा जल प्रबंधन से विश्वसनीय सिंचाई सुविधा प्रदान की जा सकती है। भाग्यवश भारतवर्ष के 65% असिंचित हिस्से में इससे ज्यादा बारिश होती है। 33% हिस्से में 1100 मिमी. से ज्यादा तथा 32% हिस्से में 750- 1100 मिमी. बारिश होती है। यदि क्षेत्र में होने वाली इस बारिश का सही ढ़ंग से उपयोग किया जाए तो यह सिंचाई का एक मुख्य स्रोत बन सकता है और इस स्रोत से पूरे वर्ष भर सिंचाई के लिए जल उपलब्ध हो सकता है।
     जलागम प्रबंध परियोजना के तहत वर्षा जल प्रबंधन का एक वृहद कार्यक्रम चलता है। दुर्भाग्यवश इस परियोजना के तहत  बहुत ढेर सारी सरंचनाएं (Structures) बनाने के बावजूद किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने में कोई खास सफलता प्राप्त नहीं हुई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि जिन क्षेत्रों में यह परियोजना कार्यान्वित हुई है वहाँ भी सूखे के दौरान फसलोत्पादन प्रभावित हुआ है। इसका कारण यह है कि सामान्यतया जलागम प्रबंध कार्यक्रम के अंतर्गत तालाबों का निर्माण अलग अलग स्थलों पर होता है और इस तरह सिंचित क्षेत्र भी छोटे छोटे टुकड़ों में दूर-दूर होते हैं। असिंचित क्षेत्र बहुल होने के कारण के कारण इन जगहों में अनियंत्रित जानवरों की चराई एक गंभीर समस्या है। इस कारण दूर-दूर बसे छोटे टुकड़ों में पानी उपलब्ध होने के बावजूद दूसरी फसल उगाना कठिन होता है साथ ही छोटे छोटे टुकड़ों की देखरेख करना भी काफी कष्टसाध्य है और इस तरह इन तालाबों की सिंचन क्षमता का कोई खास उपयोग नहीं हो पाता है। अन्तत: इतनी धनराशि व्यव करने के बावजूद भी वास्तविक सिंचन क्षेत्रफल में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है। अत: प्रधानमंत्री कृषक सिंचाई योजना को सही ढंग से कार्यान्वित करने के लिए हमें नई ठोस रणनीति बनानी होगी। One size fit all का सिद्धान्त छोड़कर हमें हर ग्राम पंचायत के स्तर पर उस ग्राम के जल संसाधनों का अध्ययन कर सही तकनीक के इस्तेमाल से उन जल संसाधनों का दक्षतापूर्वक दोहन एवं उपयोग करना पड़ेगा। इस पूरी योजना के बनाने एवं क्रियान्वयन में ग्रामवासियों की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। चूँकि पूर्वी भारत में वर्षा भी ज्यादा है तथा सिंचित क्षेत्र भी कम है, अत: हम शुरुआत इस क्षेत्र से कर सकते हैं। इसके अलग अलग क्षेत्रों के लिए विकसित तकनीकें जिनका प्रयोग इस परियोजना में किया जा सकता है, उनका विवरण निम्नलिखित है
(1) पूर्वी भारत के पठारी क्षेत्र (झारखंड, उत्तर-पश्चिम एवं पश्चिमी ओडिशा, पश्चिम बंगाल के दक्षिणी जिले एवं छत्तीसगढ़)   
पोखर सह कुंआ तंत्र
   यह तंत्र पूर्वी भारत के पठारी हिस्सों के लिए बहुत ही मुफीद है। इसके तहत चित्र 1 में दिखाये गए चित्र के अनुसार परिभाषित घाटी में टैंकों और कुंओं की एक नियमित श्रंखला बनाई जाती है। इस तंत्र का सिद्धान्त दोहरा है: पहला कि एक पोखर का कमांड क्षेत्र दूसरे पोखर का केचमेंट क्षेत्र (Catchment Area) होता है और इस तरह से ज्यादा वर्षा जल को हम रोक सकते हैं; दूसरा कि पोखर से रिसने वाले पानी और सामान्य रिसने वाले पानी को पोखर से 150-300 मीटर दूर घाटी के निचले हिस्से में एक कुंए के द्वारा पुन: प्रयोग के लिए निकाल जा सकता है। टैंक को नाले के बीच में या उसके बगल में बनाया जा सकता है। कुंए को जल निकास लाइन (Drainage line) में ऐसी जगह पर खोदा जाता है जहां पोखर से रिसने वाला पानी, खेतों से रिसा हुआ पानी तथा किनारों की ढंलुवा जमीन से रिसा हुआ पानी आपस में मिलता है। कुंए के स्थल के चयन में किसी भी हालत में समझोता नहीं होना चाहिये। कुंए का व्यास 6 मीटर तथा गहराई 8 मीटर होना चाहिये। पोखर की क्षमता 3000 घन मीटर या इससे अधिक होनी चाहिये। यदि पोखर अधिक बड़ा है तो कुंओं की संख्या एक से अधिक होनी चाहिये।
   सिंचित क्षेत्र इस श्रंखला के दोनों तरफ होता है जहां पानी पंप करके पाइप से पहुंचाया जा सकता है। यदि जल निकास लाइन की लंबाई 1 किमी. है तो यह श्रंखला लगभग 40 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित कर सकती है। चूँकि यह सारा सिंचित क्षेत्र एक लगातार जुड़ा हुआ (Contiguous) क्षेत्र होता है अत: इससे अधिक बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है। चूँकि अधिकांशत: असिंचित क्षेत्रों में चकबंदी नहीं हुई है अत: लाभान्वित कृषकों की संख्या भी अधिक होती है। इस तरह यह एक समावेशी (inclusive) तंत्र है।
   ओडिशा राज्य के दो गाँवो में इस तंत्र का विकास कर आकलन किया गया और यह पाया कि वर्ष 2002 तथा वर्ष 2009 के सूखे के दौरान  भी सिंचित क्षेत्रों की फसल उत्पादकता में कोई अंतर नहीं पड़ा। इस सिंचाई तंत्र से प्रति हेक्टेयर सिंचाई सुविधा की लागत बड़ी सिंचाई परियोजना की लागत का करीब 1/5 से 1/7  ही है। खरीफ में अधिक उपज, रबी एवं ग्रीष्मकाल की अतिरिक्त फसलों तथा पानी के बहुमुखी उपयोग से होने वाले लाभ से इस तंत्र की लागत 3-4 वर्षों में वापिस मिल जाती है। सही नियोजन एवं प्रकल्प निर्माण से इस विधि द्वारा पठारी क्षेत्रों के गाँवों में 25- 50% तक कृषि भूमि की सिंचित किया जा सकता है जो इस विधि की एक महत्वपूर्ण क्षमता को दर्शाता है।


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चित्र 1. पोखर सह कुंआ तंत्र
(2) दक्षिणी एवं पश्चिमी ओडिशा, छत्तीसगढ़ एवं झारखंड के पहाड़ी क्षेत्र
    इन क्षेत्रों में छोटी छोटी धाराएँ एवं झरने काफी मात्रा में पाये जाते हैं। इसके अलावा ओडिशा के कोरापुट एवं कालाहांडी जैसे जिलों में घाटी में जमीन के नीचे से रिसाव पानी बहता रहता है। दक्षिणी ओडिशा के कालाहांडी जिले में अध्ययन करते हुए पाया गया कि इन घाटियों में यदि कुंओं की एक श्रंखला बना दी जाए तो उनसे न केवल घाटी बल्कि दोनों तरफ की ढालू जमीनों पर भी सिंचाई सुविधा दी जा सकती है। यह ढालू जमीने बागवानी के लिए बहुत ही उपयुक्त है और सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर इन क्षेत्रों में बागवानी क्षेत्र में एक क्रांति लायी जा सकती है। साथ ही बहुत सीमित सिंचाई द्वारा चारा उत्पादन में काफी बढ़त हासिल की जा सकती है। इन ढालू क्षेत्रों में यदि चारा उत्पादन हो तो आदिवासियों में पशुपालन द्वारा रोजगार की काफी संभावनाएं पैदा होंगी तथा भू क्षरण भी रूकेगा।
     छोटी छोटी धाराओं तथा झरनों के जल को मोड़कर खेतों तक पहुंचाया जा सकता है। एक सही डिजाइन तथा निर्माण और उपयोग रणनीति से न केवल किसानों तक सिंचन सुविधा पहुंचेगी बल्कि ‘more food per drop’ का मिशन भी पूरा होगा।
(3) समुद्र तटीय क्षेत्र  
    इन समुद्र तटीय क्षेत्रों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला जो समुद्र तट से 15 किमी. की दूरी के अंदर हैं जहाँ पर भूगर्भ जल के दोहन की इजाजत नहीं दी जाती है, तथा दूसरा 15 किमी. के बाद का इलाका जहाँ पर भूगर्भ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है परंतु एक सीमा से अधिक दोहन होने पर समुद्र जल के प्रवेश का खतरा है। पहले क्षेत्र के लिए एक समेकित जल स्रोत विकास के लिए एक तकनीक विकसित की गयी है जिसमें 100 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 3-4 छोटी क्षमता के पम्प (2-3 हॉर्स पावर) द्वारा भूगर्भ जल का दोहन, सही जगहों पर पोखर का निर्माण जो बरसात में सिंक का कम करे (अधिक पानी को एकत्रित करके) तथा बरसात के बाद जल स्रोत का काम करे, तथा समुद्र में मिलने वाली छोटी नदियों पर काम ऊंचाई वाले बाँध बनाकर समुद्री लवणता को कम कर उनके पानी का उपयोग आदि शामिल है। इससे न केवल सिंचन व्यवस्था बेहतर होगी बल्कि पोखर एवं नदी के पानी के रिसाव से समुद्री पानी को जमीन की तरफ आने से भी रोका जा सकेगा।
    समुद्र तट से 15 किमी. से ज्यादा के इलाके में यदि भूगर्भ जल का दोहन तथा जितना दोहन करें उतना ही पुन:भरित (Recharge) करें तो एक संतुलन बना रहेगा। इस तरह के तंत्र से धान-परती फसल चक्र वाले बड़े भूभाग को धान-धान फसल चक्र में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे पूर्वी क्षेत्र में द्वितीय हरित क्रांति का उद्देश्य भी पूरा होगा।
(4) पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार के उपजाऊ मैदानी क्षेत्र
    इन क्षेत्रों में भूगर्भ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिसका दोहन कम लागत में किया जा सकता है परंतु बिजली आपूर्ति न होने से डीजल आधारित पंप का उपयोग करना पड़ता है। डीजल की कीमत अधिक होने के कारण छोटे एवं मध्यम किसान सिंचन व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। इसका एक बहुत ही सरल उपाय है कि यहाँ सौर ऊर्जा चालित पंप का उपयोग किया जाए। सूर्य की कम रोशनी के दौरान भी जल उपलब्ध रहे, इसीलिए इस सिंचन तंत्र में एक पोखर भी जोड़ना होगा। पोखर जल का उपयोग मछली पालन, बतख पालन तथा मेड़ का उपयोग बागवानी एवं सब्जी उगाने के लिए किया जा सकता है। यदि पोखर को सामुदायिक जगह पर बनाया जाए तो इसे भूमिहीन लोगों को पानी के बहुमुखी उपयोग के लिए दिया जा सकता है जिससे वे भी इस परियोजना से लाभान्वित हों।
    हाल ही के समय में यह देखा गया है कि इन क्षेत्रों में भूगर्भ जल स्तर दिन प्रतिदिन गिर रहा है या घटता जा रहा है जिसके कारण आर्सेनिक की समस्या उत्पन्न हो रही है। इससे बचने के लिए सिंचन तंत्र में भूजल पुन:भरित व्यवस्था को भी शामिल करना पड़ेगा।
क्रियान्वयन पद्धति एवं लाभ
     इस पद्धति के क्रियान्वयन के लिए हर ग्राम के लिए उनके संसाधनों के हिसाब से योजना बनानी होगी। शुरुआत में जिलाधिकारी द्वारा ग्राम पंचायतों से उनकी रुचि की अभिव्यक्ति (Expression of Interest) मंगानी होगी। जो पंचायतें इसके लिए राजी हों  उनके यहाँ संसाधनों का सर्वे करके परियोजना का एक खाका तैयार करना होगा तथा लाभान्वित किसानों की सूची तैयार करनी होगी। इसके बाद हर ग्राम पंचायत के लिए एक ‘Special Purpose Vehicle’ की तर्ज पर एक संस्था का गठन करना होगा जिसके पाँच मुख्य Share holder होंगे (लाभान्वित किसान, जिला प्रशासन, कार्यान्वयन एजेंसी, ग्राम पंचायत,  तथा बिजली सप्लाई करने वाली संस्था)। लाभान्वित किसान इस संस्था के फंड में 1000 रूपये प्रति हेक्टेयर की दर से अपना अंशदान देंगे। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति वाले किसानों को इससे छूट मिलेगी और उनका अंशदान परियोजना के फंड से दिया जाएगा। जिला प्रशासन चूँकि योजना राशि देगा इसलिए शेयर होल्डर की हैसियत से उसकी जिम्मेदारी समय से राशि देना तथा उसके उपयोग पर निगरानी रखना होगा। जिला प्रशासन का एक सदस्य संस्था का मुख्य अधिकारी होगा। कार्यान्वयन एजेंसी सही निर्माण की गारंटी देगी। बिजली वितरक एजेंसी सही बिजली सप्लाई की गारंटी देगी। संस्था बिजली वितरक एजेंसी को यह गारंटी देगी कि उसके देयों का भुगतान समय पर किया जाएगा। अंशदान कि राशि इसके लिए मुख्य आकस्मिक राशि का काम करेगी जो किसी किसान द्वारा बिजली बिल नहीं देने पर संस्था द्वारा एजेंसी को दी जाएगी। अन्य विवरण संस्था द्वारा बनाए जाएंगे।
परियोजना के अन्य लाभ
    पश्चिमोत्तर भारत में धान- गेहूँ फसल चक्र देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान करता है परन्तु धान की खेती में अधिक पानी का प्रयोग होने से वहाँ का भूगर्भ जल स्तर काफी नीचे चला जा रहा है। यदि पूर्वी भारत के एक बड़े हिस्से में इस परियोजना के चलते सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाए तो ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार के उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों में धान की उपज काफी बढ़ायी जा सकती है। तब पश्चिमोत्तर भारत में धान की खेती का क्षेत्रफल कम किया जा सकता है। एक अनुमान के अनुसार पंजाब में भूगर्भ जल का उपयोग 80% पर लाने के लिए करीब 6 लाख हेक्टेयर जमीन से धान की खेती हटानी पड़ेगी। इससे धान के कुल उत्पादन में 30 लाख टन की कमी होगी। इस कमी को पूर्वी भारत में सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध करवाकर धान के उत्पादन की कमी को पूरा किया जा सकता है। इस तरह इस परियोजना को पूर्वी क्षेत्र में लागू कर दो महत्वपूर्ण उद्देश्य पूरे किए जा सकते हैं: पहला इस क्षेत्र से गरीबी का उन्मूलन तथा दूसरा पश्चिमोत्तर भारत में फसल विविधता लाकर भूगर्भ जल के अति दोहन की समस्या का निराकरण।
उपसंहार    

     उपरोक्त तकनीकों द्वारा जल स्रोतों या संसाधनों के समेकित विकास को पीने के पानी की सप्लाई से भी जोड़ा जा सकता है। पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में इससे न केवल पीने के पानी की समस्या कम होगी अपितु शोचालयों का उपयोग भी बढ़ेगा। पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में शोचालयों के उपयोग न होने का एक बड़ा कारण पानी की अनुपलब्धता है। इस परियोजना को सही ढ़ंग से कार्यान्वित करने पर प्रधान मंत्री जी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार होने में भी बहुत मदद मिलेगी।     

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